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pratik waikar kho kho player: खो-खो वर्ल्ड कप विजेता कप्तान की प्रेरणादायक कहानी

Pratik Waikar भारतीय खो-खो जगत का एक उभरता हुआ नाम है। अपनी तेज रफ्तार, चुस्ती और बेहतरीन रणनीति के कारण उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान बनाई है। प्रतिक वैकर ने कम उम्र में ही यह साबित कर दिया कि कड़ी मेहनत और समर्पण से किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

प्रतीक वायकर खो-खो खिलाड़ी
pratik waikar kho kho player

प्रतीक वायकर: मिट्टी के मैदान से वर्ल्ड कप के मंच तक का सफर

आइये हम उनका वह शफर देखते है जहा वह शंघर्ष कर रहे थे।   कसे उन्होंने अपनी जर्नी शुरू कथि ुर कैसे वह पहुंचे खो खो के इस मंच तक। आज के टाइम में अगर कोई आपसे पूछे कि खो-खो का सबसे बड़ा खिलाड़ी कौन है, तो जुबान पर एक ही नाम आता है— प्रतीक वायकर। प्रतीक ने वो कर दिखाया जो आज तक किसी ने नहीं किया था। अपनी कप्तानी में उन्होंने भारत को पहला खो-खो वर्ल्ड कप (2025) जिताकर इतिहास रच दिया। लोग उन्हें प्यार से खो-खो का ‘धोनी’ या ‘कैप्टन कूल’ भी कहते हैं।

Pratik Waikar का पूरा नाम प्रतीक कीरन वाईकर है। उनका जन्म 27 मार्च 1992 को पुणे के सदाशिव पेठ इलाके में हुआ। वह भारतीय खो-खो टीम में वज़ीर पोजीशन पर खेलते हैं और इन दिनों अल्टीमेट खो-खो लीग में तेलुगु योद्धास टीम का हिस्सा हैं। लोग उन्हें प्यार से ‘कैप्टन कूल’ भी बुलाते हैं क्योंकि मैदान पर उनका दिमाग हमेशा ठंडा रहता है और मुश्किल वक्त में भी टीम को संभालने की कला उनमें कूट-कूटकर भरी है

इस लेख में हम प्रतीक वाईकर के बचपन से लेकर वर्ल्ड कप जीतने तक के सफर को विस्तार से कवर करेंगे। जानेंगे कि कैसे उन्होंने महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में नौकरी करते हुए खो-खो को अपना जुनून बनाए रखा, कैसे उन्होंने U-14 से लेकर सीनियर लेवल तक हर उम्र में महाराष्ट्र की कप्तानी की, और कैसे उनकी कप्तानी में भारत ने वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रच दिया।

pratik waikar kho kho biography

Pratik Waikar का जन्म और प्रारंभिक जीवन

प्रति कके बारेमे आपनइ कई श्री जगहोंपर सुना होगा , हम आज उसी प्रतिक के बारेमे उनके जीवन के बारेमे आपको बताने जरा हे है।  आपको उनका पूरा जीवन हम इस न्यूज़ में आपको बता देंगे।  Pratik Waikar का जन्म 27 मार्च 1992 को पुणे के सदाशिव पेठ इलाके में हुआ। उनके पिता रिटायर्ड हैं और उनका कैटरिंग का बिजनेस है, जबकि उनकी मां हाउसवाइफ हैं। प्रतीक का परिवार शुरू से ही खिलाड़ी रहा है। उनके बड़े भाई भी शानदार खो-खो खिलाड़ी थे और सेंट्रल रेलवे की तरफ से खेलते थे। प्रतीक मानते हैं कि उनके भाई की रिफ्लेक्सिस इतनी तेज थीं कि वह हमेशा उनकी तरह खेलना चाहते थे

प्रतीक ने सिर्फ 8 साल की उम्र में खो-खो खेलना शुरू कर दिया था। शुरू में वह ‘लंगड़ी’ नाम का एक और देसी खेल खेलते थे, लेकिन उनके इलाके में खो-खो के काफी अच्छे खिलाड़ी रहते थे। एक किस्सा उन्होंने खुद शेयर किया है कि उनके सामने वाले घर में एक शानदार खिलाड़ी रहता था।कई मुस्किलो के बाद उनके जीवन खो खो के इस मैदान में रंग लाया है।   एक दिन उस खिलाड़ी को ‘शिवाजी अवॉर्ड’ मिला और पूरे इलाके में ढोल-ताशे के साथ जश्न मनाया गया। यह देखकर छोटे प्रतीक के मन में यही बात बैठ गई कि उन्हें भी खो-खो में कुछ बड़ा करना है।

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प्रतीक ने BSc की डिग्री हासिल की और उसके बाद MBA इन फाइनेंस भी किया। लेकिन उनका असली जुनून खो-खो ही था। U-18 लेवल पर शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (Maharashtra State Electricity Board) में स्पोर्ट्स कोटे से सीधी भर्ती मिल गई। यह उनके परिवार के लिए बड़ी राहत थी क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति पहले ज्यादा अच्छी नहीं थी। 19 साल की उम्र में उन्हें पहली नौकरी मिल गई। उनके भाई भी U-18 के बाद रेलवे में सिलेक्ट हो गए थे, इसलिए परिवार की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे सुधरने लगी।

Pratik Waikar के अवॉर्ड्स और उपलब्धियां

उनकी खेल उपलब्धियां किसी से छिपी नहीं हैं.  हम शब् जानते है की वह एक खो खो प्लेयर के जगत में शबसे मचे हुए खिलाडी है।  उनके कारनामे , उनके होस उड़ने वाले किच्चे आज हम इस आर्टिकल में जानेंगे। 

  • 2019: एकलव्य अवॉर्ड (Ekalavya Award)
  • 2021: छत्रपति संभाजी राजे अवॉर्ड (Chhatrapati Sambhaji Raje Award)
  • सीनियर नेशनल चैंपियनशिप: 3 गोल्ड, 7 सिल्वर (कुल 10 मेडल)
  • फेडरेशन कप नेशनल: 6 गोल्ड मेडल
  • जूनियर नेशनल: 1 गोल्ड मेडल
  • सब-जूनियर नेशनल: 2 ब्रॉन्ज मेडल
  • साउथ एशियन गेम्स 2016: गोल्ड मेडल
  • फेडरेशन कप नेशनल में लगातार 3 बार बेस्ट प्लेयर अवॉर्ड

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Pratik Waikar का खो-खो करियर: U-14 से वर्ल्ड कप तक का सफर

उनके वर्ल्ड कप और ु – १४ वर्ल्ड कप के बारेमे हम बात करे टी  वह कुछ ऐसे है।  प्रतीक वाईकर ने 2003 में महाराष्ट्र के लिए U-13 नेशनल खेलना शुरू किया। वह महाराष्ट्र के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने U-14, U-18 और सीनियर – तीनों उम्र वर्गों में महाराष्ट्र टीम की कप्तानी की। उनके नाम शानदार उपलब्धियां दर्ज हैं:

  1. सीनियर नेशनल: 10 मेडल (3 गोल्ड, 7 सिल्वर)
  2. फेडरेशन कप नेशनल: 6 गोल्ड मेडल
  3. जूनियर नेशनल: 1 गोल्ड मेडल
  4. सब-जूनियर नेशनल: 2 ब्रॉन्ज मेडल

प्रतीक ने 2016 में भारतीय टीम के लिए अंतरराष्ट्रीय डेब्यू किया। यही वो साल था जब भारतीय टीम ने साउथ एशियन गेम्स (SAF Games) में गोल्ड मेडल जीता था। उस जीत के दौरान जब मैदान में तिरंगा फहराया गया, तो प्रतीक के लिए वह सबसे यादगार पल था। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने लंदन में भारत बनाम इंग्लैंड सीरीज में भी हिस्सा लिया और वहां भी भारत ने गोल्ड जीता

प्रतीक वाईकर अल्टीमेट खो-खो लीग (UKK) में तेलुगु योद्धास टीम के लिए खेलते हैं। उन्होंने सीजन 1 में टीम की कप्तानी की और 12 मैचों में अटैक में 55 पॉइंट बनाए। डिफेंस में उनका टोटल टाइम 20:13 मिनट रहा और वह टॉप 3 डिफेंडर्स में शामिल रहे। सीजन 2 में उन्होंने अपने प्रदर्शन को और बेहतर किया। वज़ीर पोजीशन पर खेलते हुए उन्होंने 68 पॉइंट बनाए और ‘टूर्नामेंट के बेस्ट अटैकर’ का अवॉर्ड अपने नाम किया। उनकी अगुवाई में तेलुगु योद्धास प्लेऑफ में पहुंची और रनर-अप रही। UKK में उनका ओवरऑल रिकॉर्ड शानदार है – 23 मैच, 123 पॉइंट, 34 टच पॉइंट और 89 डाइव पॉइंट।

प्रतीक ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि कैसे स्पोर्ट्स साइंस टेक्नोलॉजी ने उनकी परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने में मदद की। उन्होंने कहा कि अब ऐसी टेक्नोलॉजी आ गई है जो हमारे शरीर का पूरा असेसमेंट करती है। इससे पता चलता है कि कौन-सी मसल्स ज्यादा इस्तेमाल हो रही हैं और कौन-सी सही से इस्तेमाल नहीं हो रही हैं। इससे उन्हें अपनी फिटनेस और गेम को और बेहतर करने में मदद मिली।

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